Poem on women
- gaurav99a5
- Mar 9, 2018
- 2 min read
तुम प्रकृति स्वयं में हो, विराजती हर मन में हो
तुम चंद्रमा का प्यार हो, तुम छाँव का दुलार हो,
तुम युद्ध में जो वीर हो, तुम प्यास में जो नीर हो,
तुम नाव की पतवार में, तुम पौध की क्यार में
तुम मन के हर विचार में, तुम नित्य हर आचार में
मस्तिष्क की तरंग में, निश्चय की हर पतंग में
तुम पुष्प के हर रंग में, हर कष्ट मेरे संग में
तुम बाग की बहार में, हर गोधुली बयार में
तुम याद में, तुम प्यास में, तुम भूख में तुम आस में,
तुम कल्प में समक्ष में, तुम क्रष्ण शुक्ल पक्ष में।
तुम प्रेम हो वियोग भी, तुम योग का संयोग भी,
तुम त्याग में बलिदान में, तुम शीष में सम्मान में
तुम गर्व में अभिमान में तुम बाल की मुस्कान में
तुम आर्य में तुम दास में, तुम आम में तुम ख़ास में
तुम प्यार हो तुम प्रीत भी, तुम युद्ध भी तुम जीत भी,
तुम पल्लवों के रंग में, बसन्त की उमंग में,
तुम गर्द की उड़ान में, तुम पंछियों की तान में,
तुम नदी के बहाव में, तुम ठण्ड के अलाव में,
थाल के हर भोज में, तुम कष्ट में तुम मौज में
तुम त्याग में तुम भोग में, वैराग्य में तुम जोग में
तुम लेखनी के सार में तुम काव्य के विस्तार में
लहू के हर इक तार में, तुम जीवनी के सार में
तुम युवा में तुम व्रद्ध में तुम हास्य में तुम क्रुद्ध में
तुम सुशील हो तुम क्रान्त हो, तुम तीव्र हो तुम शांत हो
तुम मेघ की हो गर्जना कृषक का तुम सुकून हो
जन्मदात्री हो तुम, रगों में बहता खून हो
तुम आरती हो ईश की तुम प्रभु चरण वन्दना,
तुम नील रंग गगन सी तुम तेज वेग यवन सी
नृप से बड़ी रानी हो, इतिहास की कहानी हो
अमृता हो जीव की, आनंद से भरपूर हो
तुम कुसुम हो प्रभु चरण के बलिदान हो तुम करण के
अंधियार अंत ऊषा हो, पश्चात् विष के पीयूषा हो
तुम कविता हो मन की मेरे कल्पना विचार की
तुम कामना सद्कर्म की, और करूणा लाचार की
तुम बाग़ के मयूर हो, तुम मुक्ता हो हर सीप में ,
तुम दुखों की निवारनी, हर कष्ट तुम समीप में
तुम नदियों के बहाव में, तुम शहर में तुम गाँव में
तुम प्राण की जो वायु हो तुम अजर अमर आयु हो
तुम स्वर्ण की दमक में हो, रजत की तुम चमक में हो
तुम समस्त वर्ण साथमे, हो चक्र कृष्ण हाथमे
तुम बसन्त की पलाश हो, संग गंगा कैलाश हो
तुम कृष्ण प्रेम रंग हो, हर पुरुष वाम अंग हो
तुम प्रकृति का अंश हो तुमसे ही आगे वंश हो
धरा पे ईश रूप हो, स्वयं श्रष्टि स्वरूप हो
तुम श्रष्टि स्वरुप हो, तुम श्रष्टि स्वरुप हो…….



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